
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें अधिवेशन मां भारत अउर पाकिस्तान के बीच एक बार फिर उहे पुरान सवाल सामने आइन, जेकर समाधान दक्खिन एशिया की शांति अउर स्थिरता कै खातिर बहुत जरूरी अहै। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 81वां अधिवेशन 8 सितंबर 2026 से सुरू भवा अउर एकर सामान्य बहस 22 से 26 सितंबर के बीच रही। इ बरस की बहस का घोषित केंद्रीय विषय रहा- विश्वास बहाल करना, परिवर्तन का प्रबंधन करना अउर अइसन संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था बनाना जो सबके खातिर प्रभावी हो। अइसन समय मां जब दुनिया युद्धों, आतंकवाद, आर्थिक असमानता, ऊर्जा संकट अउर भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही अहै, इ सवाल अउर महत्वपूर्ण हो जात अहै कि दक्खिन एशिया कब पुरान विवादों के चक्र से बाहर निकलि जाई।
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर 26 सितंबर का महासभा मां सटीक, तीक्ष्ण अउर प्रभावी वक्तव्य मां पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहिन कि एक ‘सीरियल प्रैक्टिशनर ऑफ टेररिज्म’ एक दिन पहिले तथ्यों का गलत ढंग से प्रस्तुत करिन अउर आतंकवाद का सामान्य बनाने तथा ओकर परिणामों से बचने का प्रयास करिन, जिसे स्वीकार नइयां की जाइ सकत। ऊ इ भी कहिन कि भारत आतंकवाद के विरुद्ध आत्मरक्षा के अपने अधिकार का प्रयोग करी अउर आतंकवाद का प्रायोजित करने वाली सरकारों का जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। ऊ आतंकवाद के वित्तीय स्रोतों का उजागर करने अउर उन पर कार्रवाई की आवश्यकता का भी रेखांकित करिन।
एककर एक दिन पहिले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने संबोधन मां कश्मीर का मुद्दा उठाइन अउर भारत द्वारा सिंधु जल संधि का रोकने के निर्णय की आलोचना करिन। पाकिस्तान इका अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करिन, जबकि भारत की ओर से पाकिस्तान के सीमा-पार आतंकवाद संबंधी रुख पर सवाल उठाए गए। पाकिस्तान की प्रतिनिधि भी भारत पर आतंकवाद अउर कश्मीर को लेकर गंभीर आरोप लगाइन। इ प्रकार संयुक्त राष्ट्र का मंच एक बार फिर दुनु देशों के पारस्परिक आरोप-प्रत्यारोप का साक्षी बना। लेकिन असली प्रश्न इ अहै कि इन आरोपों के बाद भी समाधान की दिशा मां कितना रास्ता तय भवा?
पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा प्रश्न आतंकवाद को लेकर ओकर नीति का अहै। भारत लगातार इ आरोप लगावत रहा अउर पाकिस्तान की धरती से या ओकर संरक्षण मां सक्रिय आतंकी नेटवर्क भारत की सुरक्षा के खातिर चुनौती पैदा करत अहै। जयशंकर इसी संदर्भ मां कहिन कि आतंकवाद अउर मित्रता साथ-साथ नइयां चल सकत अउर आतंकवाद के कर्ता का अपना रास्ता बदलना होई। दूसरी ओर पाकिस्तान भारत पर भी आतंकवाद का समर्थन देने के आरोप लगावत अहै अउर अपने यहां होने वाली हिंसक घटनाओं के खातिर भारत का जिम्मेदार ठहरावत अहै।
इन परस्पर आरोपों की सच्चाई अउर प्रमाण अलग-अलग मामलों मां जांच का विषय हो सकत अहैं, लेकिन एतना निर्विवाद अहै कि पाक आतंकवाद का पोषित कर भारत की शांति का भंग करत रहा अहै, इन आतंकी घटनाओं दोनों देशों की जनता का भारी मानवीय, आर्थिक अउर सामाजिक कीमत चुकाने पर मजबूर करिन। तव फिर सवाल उठत अहै- पाकिस्तान आखिर कब इ स्वीकार करी कि आतंकवाद किसी भी राष्ट्र की स्थायी विदेश नीति नइयां बन सकत?
आतंकवाद यदि किसी देश के खातिर रणनीतिक साधन बनत अहै तव अंततः वही साधन ओकर देश की आंतरिक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था अउर अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता के खातिर भी समस्या बन सकत अहै। पाकिस्तान स्वयं लंबे समय से आतंकवादी हिंसा से जूझ रहा अहै। अइसन मां ओकर सामने इ ऐतिहासिक अवसर अहै कि ऊ आतंकवाद के प्रश्न का केवल भारत-विरोधी दृष्टिकोण से न देखकर अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा अउर भविष्य के संदर्भ मां भी देखे। आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई केवल किसी दूसरे देश की मांग पूरी करने के खातिर नइयां, बल्कि पाकिस्तान के अपने नागरिकों की सुरक्षा के खातिर भी आवश्यक अहै।
दूसरा प्रश्न कश्मीर का अहै। पाकिस्तान इ बार भी संयुक्त राष्ट्र महासभा मां कश्मीर का मुद्दा उठाइन। लेकिन लगभग आठ दशक से चली आ रही इ बहस इ साबित कर दिहिन कि केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बयान देने से समस्या का समाधान नइयां होत। कश्मीर के नाम पर भारत अउर पाकिस्तान के बीच अविश्वास बढ़त अहै, सुरक्षा तनाव पैदा होत अहै अउर दुनु देशों की विकास प्राथमिकताएं प्रभावित होत अहैं। यदि पाकिस्तान वास्तव मां क्षेत्रीय शांति अउर स्थिरता चाहत अहै, तव ओका इ विचार करना होई कि कश्मीर का अपनी विदेश नीति के स्थायी केंद्र मां रखकर ऊ अपने नागरिकों के भविष्य के खातिर का हासिल कर रहा अहै।
हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर का उल्लेख करना अउर घरेलू समस्याओं का पीछे छोड़ देना किसी भी देश के खातिर दीर्घकालिक समाधान नइयां हो सकत।
तीसरा अउर शायद सबसे गंभीर प्रश्न पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अउर वहां के आम नागरिक की जिंदगी का अहै। महंगाई, रोजगार, ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य अउर सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे किसी भी सरकार के खातिर मूलभूत जिम्मेदारियां अहैं। विदेश नीति तभी सार्थक होत अहै जब ओकर अंतिम उद्देश्य देश के नागरिकों के जीवन का सुरक्षित, समृद्ध अउर सम्मानजनक बनाना हो।
पाकिस्तान के खातिर इ समय इ बात पर गंभीरता से विचार करने का अहै कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ राजनीतिक अउर कूटनीतिक अभियान चलाने की तुलना मां ओकर जनता की आर्थिक आवश्यकताओं, संस्थागत स्थिरता अउर मानव विकास पर अधिक ऊर्जा लगाना कितना आवश्यक अहै।
इ भी उतना ही महत्वपूर्ण अहै कि भारत-पाक संबंधों का केवल आरोप-प्रत्यारोप के चश्मे से न देखा जाइ। भारत की अपनी सुरक्षा चिंताएं वास्तविक अहैं अउर किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा करना अहै। जयशंकर भी संयुक्त राष्ट्र मां भारत के आत्मरक्षा के अधिकार अउर आतंकवाद के विरुद्ध शून्य-सहिष्णुता की बात कहिन। लेकिन इसी के साथ क्षेत्रीय शांति के खातिर इ भी आवश्यक अहै कि आतंकवाद के विरुद्ध दृढ़ता अउर संवाद की संभावनाओं के बीच संतुलन खोजा जाइ। संवाद तभी सार्थक हो सकत अहै जब हिंसा अउर आतंकवाद के प्रश्न पर स्पष्टता हो।
पाकिस्तान का इ भी समझना होई कि दुनिया आज केवल बयान नइयां सुनत, बल्कि नीतियों अउर व्यवहार का भी देखत अहै। संयुक्त राष्ट्र महासभा का मूल उद्देश्य ही बहुपक्षीय संवाद, शांति अउर सहयोग के खातिर मंच उपलब्ध कराना अहै। यदि इ मंच का इस्तेमाल एक-दूसरे के विरुद्ध आरोपों का दोहराने मां ही होत रहे, तव दुनु देशों के नागरिकों का उससे का हासिल होई?
भारत अउर पाकिस्तान दुनु परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी अहैं। इसलिए इनके बीच तनाव केवल द्विपक्षीय समस्या नइयां रहत, ओकर प्रभाव पूरे दक्खिन एशिया की सुरक्षा अउर वैश्विक स्थिरता पर पड़ सकत अहै। आज पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा आत्ममंथन इ होना चाहिए कि ऊ अपने भविष्य का किस आधार पर निर्मित करना चाहत अहै- पुरान विवादों, कश्मीर-केंद्रित राजनीति अउर आतंकवाद के आरोपों के आधार पर या आर्थिक विकास, शिक्षा, रोजगार, संस्थागत मजबूती अउर क्षेत्रीय सहयोग के आधार पर?
भारत के सामने भी चुनौती इ अहै कि सुरक्षा से समझौता किए बिना दक्खिन एशिया मां स्थायी शांति की संभावनाओं का खुला रखा जाइ। पाकिस्तान कब बदली, एकर उत्तर कोई दूसरा देश नइयां दे सकत। परिवर्तन अंततः पाकिस्तान की अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति, संस्थागत निर्णयों अउर नीति-निर्माताओं पर निर्भर करी। लेकिन दिशा स्पष्ट अहै- आतंकवाद का किसी भी रूप मां राजनीतिक साधन न बनने देना, अपनी जनता की आर्थिक जरूरतों का प्राथमिकता देना, कश्मीर के नाम पर लगातार टकराव की नीति से आगे बढ़ना अउर पड़ोसियों के साथ संबंधों का हिंसा के बजाय विश्वास तथा पारस्परिक सम्मान के आधार पर विकसित करना।
यदि पाकिस्तान इ रास्ता चुनत अहै तव ओकर लाभ केवल भारत का नइयां, स्वयं पाकिस्तान के नागरिकों अउर पूरे दक्खिन एशिया का मिली। अउर यदि ऊ पुरान रास्ते पर ही चलत रहा, तव सबसे बड़ा प्रश्न दुनिया से अधिक ओकर अपने नागरिकों के सामने खड़ा होई- आखिर कब तक अतीत की राजनीति भविष्य की पीढ़ियों का वर्तमान तय करती रही?
– ललित गर्ग (लेखक, पत्रकार, स्तंभकार)




