सिर्फ गंगा नहायै से न मिलि पुण्य, मन मां अहै ई 5 विकार तौ भूल जाव तीर्थ यात्रा कय फल
सनातन परंपरा अउर शास्त्रन कय अनुसार, खाली पवित्र तीर्थ स्थलन्ह मां जाइ या हुवां डुबकी लगाइ भर से पुण्य कय फल न मिलत अहै। जब तक मनई अपने अंतर्मन कय शुद्ध न कय लेइ, तब तक बाहरी यात्रा व्यर्थ मानी जात अहै। इसी संदर्भ मां बतावा गवा है कि, कुछ खास तरह कय स्वभाव अउर विकारन से घिरा मनइयन का तीर्थ यात्रा कय असल पुण्य फल न मिलत अहै। आवा जानि लीं कि उ 5 तरह कय लोग कवन अहैं, जौन तीर्थ यात्रा कय पुण्य न पाइ पावत।
श्रद्धाहीन मनई: नारद पुराण कय अनुसार जौन मनई श्रद्धाहीन होइके तीर्थ यात्रा पर जात अहै, ओका यात्रा कय फल न मिलत अहै। श्रद्धाहीन कय मतलब इ अहै कि, आप खाली मनोरंजन कय खातिर तीर्थ यात्रा पर जात अहा या फिर आप खाली देखावा या भीड़ कय पीछे जात अहा, तौ आप का तीर्थ यात्रा कय पुण्य फल न मिलत अहै।
पाप करै वाला मनई: जौन मनई पापाचरण यानी पाप या बुरा काम करै वाला अहै, ओका तीर्थ यात्रा कय फल न मिलत अहै। अइसन मनई चाहे जेतना गंगा नहाय लेइ या फिर तीर्थ यात्रा कय लेइ, इनका पाप करम मां तनिकौ कमी न आवत अहै।
नास्तिक मनई: अइसन मनई जेका भगवान पर विश्वास न अहै, ओका भी तीर्थ यात्रा कय फल न मिलत अहै। अइसन इहैलै अहै काहे से नास्तिक लोग तीर्थ यात्रा का पर्यटन यात्रा कय रूप मां देखत अहैं। इनका भीतर ईश्वर कय प्रति सच्चा भाव, विश्वास अउर समर्पण कय भावना न होत अहै।
संशयात्मा: संशयात्मा कय अर्थ अहै कि, संदेह या शंका से भरा रहै वाला मनई। सनातन धर्म कय अनुसार जौन मनई कय मन मां तीर्थ यात्रा का लइके संदेह कय स्थिति बनी रहत अहै, ओका कबौ तीर्थ यात्रा कय पुण्य फल न मिलत अहै। जदि मन मां ईश्वर कय प्रति सच्ची श्रद्धा, विश्वास अउर पवित्रता ही न अहै, तौ शारीरिक रूप से तीर्थ यात्रा पर जाइ व्यर्थ अहै।
तार्किक मनई: शास्त्रन कय अनुसार, तार्किक मनई का तीर्थ यात्रा कय फल इहैलै न मिलत अहै काहे से उ तीर्थ यात्रा कय दौरान हर चीज का लइके तर्क करत अहै। हिंदू शास्त्रन मां तीर्थ यात्रा का बुद्धि कय विषय न, बल्कि आस्था, श्रद्धा अउर समर्पण कय विषय माना जात अहै। तीर्थ यात्रा कय दौरान जौन मनई हर चीज मां ‘काहे’ अउर ‘कैसे’ कय जवाब ढूंढत अहै, उ तीर्थ स्थानन कय महत्व पर संदेह करत अहै, जेसे ओकर मन भक्ति मां न लाग पावत।